शबद कीर्तन से सुबह शुरू होती है, फिर चुस्कियों के साथ खबरों पर चर्चा और लंगर की तैयारियां


26 नवंबर से सिंघु बॉर्डर पर शुरू हुआ किसान आंदोलन 14वें दिन भी जारी है। यहां नजारा मिनी पंजाब जैसा है। हजारों की संख्या में यहां किसान जमा हैं। अभी कितने दिन यहां रुकना है, कोई नहीं जानता, पर तैयारियां लंबे वक्त तक ठहरने की हैं। हर व्यवस्था चाक-चौबंद है। खाने से लेकर दवाई तक की व्यवस्था संभालने में हर किसी की अपना रोल है। फोटोज के जरिए देखें किसान आंदोलन के ग्राउंड जीरो पर कैसा रहता है दिन…

सिंघु बॉर्डर पर तड़के जत्थों में किसान ढोल-मंजीरे लेकर निकलते हैं। शबद गाते हैं और इसी तरह यहां शुरू होती है सुबह।
शबद कीर्तन के बीच किसान उठने लगते हैं। साथ ही शुरू होता है आंदोलन की खबरों पर चर्चाओं का दौर।
महिलाएं भी यहां हैं। चाय की चुस्कियों के साथ वो भी आंदोलन पर अपनी राय एक-दूसरे को बताती हैं। उन्हें भी अपनी जिम्मेदारियों का अहसास है और पीछे नहीं रहना चाहती हैं।
सुबह के वक्त सबसे ज्यादा भीड़ जुटती है चाय-नाश्ते के दौरान। 100-200 मीटर पर सिंघु बॉर्डर पर सुबह का नजारा ऐसा ही रहता है।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, हजारों किसानों के लिए खाने का इंतजाम करना। लंगर में तड़के ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं ताकि वक्त पर सभी को खाना मिल सके।
राशन-पानी की कमी ना हो, इसका भी मैनेजमेंट पुख्ता है। पंजाब के गांवों से लेकर सिंघु बॉर्डर तक रसद की डिलीवरी का इंतजाम किया गया है। इसके लिए भी टीमें बनाई गई हैं।
हजारों की तादाद है और फिर भी कोई अव्यवस्था नहीं। वजह सिर्फ एक। वो ये कि हर किसी को अपना रोल पता है।
टीमें बनाई गई हैं, जो खाना, दवाइयां और जरूरत की दूसरी चीजें बांटती हैं। इन्हें सेवादार कहते हैं और इनमें सिर्फ सिख नहीं शामिल हैं, दूसरे धर्मों के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी कर रहे हैं।
सूरज चढ़ते-चढ़ते आंदोलन भी गरमाता है। दिनभर की हलचल पर नजर रखने के साथ-साथ हुक्के की गुड़गुड़ाहट के दौरान आगे की रणनीति भी तैयार की जाती है।
सिंघु बॉर्डर पर किसानों के समर्थन में बड़ी तादाद में युवा भी पहुंचे हैं। वो पोस्टर्स के जरिए अपना सपोर्ट दे रहे हैं और कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं।
किसानों के इस आंदोलन में 8 साल के बच्चों के लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग भी शामिल हैं। कोई भी पीछे नहीं है।
आंदोलन को लेकर चल रही बयानबाजी से भी किसान अनजान नहीं हैं। कंगना रनोट के बयान से कुछ किसान खा हैं और पोस्टर्स के जरिए अपनी नाराजगी बयां कर रहे हैं।
शाम होते-होते सोने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। हंसी-ठहाके लगते हैं, किस्सागोई होती है। आंदोलन के तनाव भरे माहौल को हल्का करने का ये अपना तरीका है।
किसी को गाड़ी में सोना है, तो किसी को चारपाई पर। अगर किसी कहीं जगह नहीं मिली तो वो तिरपाल डालकर सड़क पर ही सो जाता है, पर आंदोलन से नहीं हटता।

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14 दिन से किसान कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। सिंघु बॉर्डर ग्राउंड जीरो है, जहां से 26 नवंबर को आंदोलन की आग उग्र हुई और सरकार तक कड़ा संदेश पहुंचा। यहां हजारों किसान हैं और लंबे आंदोलन की तैयारी कर के आए हैं।

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