कांग्रेस राजस्थान में पंचायत चुनाव हारी, क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष संगठन नहीं बना पाए और पायलट प्रचार से दूर रहे


(अनुराग हर्ष/ विष्णु शर्मा/सुनील जैन) अशोक गहलोत-सचिन पायलट के बीच खींचतान का सीधा असर राजस्थान के पंचायत चुनाव पर पड़ा। यह पहला मौका होगा जब सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस के हाथ से बाजी निकलती दिख रही है। दरअसल, कांग्रेस प्रदेश से लेकर मैदानी स्तर तक संगठन के नाम पर कमजोर दिखी। भाजपा ने परंपरागत तरीके से चुनाव लड़ा और प्रदेश में विपक्ष में होने के बावजूद ज्यादा सीटें निकाल लाई।

21 जिलों में जिला परिषद के चुनाव हुए। 14 जिलों में भाजपा का बोर्ड बनना तय है। कांग्रेस का बोर्ड 5 जिलों में ही बन पाएगा। नागौर में 47 में से 20 सीटें भाजपा को मिली हैं। वह राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल की मदद से बोर्ड बना सकती है। डूंगरपुर में BTP का जिला प्रमुख बनेगा।

इसकी बड़ी वजह रहे मंत्री और प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा। संगठन पर उन्होंने ज्यादा फोकस नहीं किया। जैसा कि तय था पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट ने चुनाव में रुचि नहीं ली। प्रदेशाध्यक्ष बनने के बावजूद डोटासरा ‘मंत्रीत्व’ में ही मुग्ध रहे और संगठन की टीम बनाने के लिए समय नहीं निकाल पाए। हालत यह रही कि वे खुलकर प्रचार तक करने नहीं गए। अपने जिले में ही पिछड़ गए।

प्रदेश अध्यक्ष के क्षेत्र में कांग्रेस पिछड़ी

प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा लक्ष्मणगढ़ से हैं जहां पंचायत समितियों में कांग्रेस 11 पर सिमट गई। इससे ज्यादा 13 सीटें भाजपा ले गईं। पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट टोंक से विधायक हैं। वहां कांग्रेस को 19 में से 7 जबकि भाजपा को 9 सीटें मिलीं।

संगठन का दखल नहीं होने से कांग्रेस में अधिकतर टिकट सांसद-विधायकों ने ही बांट दिए। लिहाजा जमीनी पकड़ के बजाय अपनी जी-हुजूरी वालों के खाते में टिकट चले गए। कुछ ने परिवार में ही टिकट बांट लिए। यह भी सीटें कम आने का बड़ा कारण रहा।

दूसरी तरफ, मौजूदा पदाधिकारी पायलट खेमे के थे। उसने संगठन के दिशा-निर्देशाें की बजाय अपने मन की बात ही मानी। इसने पंचायत चुनाव में कांग्रेस के लिए बगावत और भितरघात दोनों के रास्ते खोल दिए।

पायलट और रघु के गढ़ में सेंध

गहलोत से किटकिट के बाद प्रदेश की राजनीति में पायलट सीधा दखल नहीं दे रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि वे नेशनल पॉलिटिक्स के लिए मन बनाते-बिगाड़ते रहे हैं। ऐसे में वे अपने ही गढ़ में ग्रामीण वोटर को खिसकने से नहीं बचा पाए।

चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा का किला भी कमजोर हुआ है। अशोक चांदना, उदयलाल अंजाना और महेंद्र चौधरी जैसे नेताओं को भी झटका लगा।

भाजपा को नागौर में लगा झटका

भाजपा के लिए भी यह चुनाव एक सबक रहा। उसने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी से नागौर में समझौता किया था। उसने गांवों में भाजपा को कमजोर कर दिया। नागौर इलाके में RLP ने नौ सीटें जीत कर भाजपा की खुशी को फीका कर दिया।

रिश्तेदारों को नहीं जिता पाए बड़े नाम

भाजपा के अर्जुनराम मेघवाल अपने बेटे को जीत नहीं दिला सके तो कांग्रेस की विधायक कृष्णा पूनिया, भाजपा के गोपीचंद मीणा भी अपने रिश्तेदारों को नहीं जिता सके। हालांकि कांग्रेस विधायक गोविंदराम ने अपनी बेटी, बेटे व पत्नी के साथ चाचा को भी जीत दिला दी।

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Congress state president Dotasara was enchanted in the post of minister, did not focus on organization

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